Akhil unnikrishnan Asst.prof
भाषा अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन है। मानव अपने भावों, मनोभावों, इच्छाओं आदि की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से ही करता है। हिन्दी हमारी मातृभाषा है। यह हमारी राष्ट्रभाषा भी है। भाषा हमारे चिन्तन, मनन एवं ज्ञान का आधार है। प्रत्येक विषय के अध्ययन का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। हिन्दी भाषा सीखने का उद्देश्य यही है कि बालक मौखिक एवं लिखित रूप में उस भाषा में विचार-विमर्श कर सकें।
शिक्षण उद्देश्य एवं शिक्षण लक्ष्य
शिक्षा के क्षेत्र में उद्देश्य व लक्ष्य शब्दों का प्रयोग सामान्यतः पर्यायवाची शब्दों के रूप में ही होता है। परन्तु इनमें कुछ अन्तर हैं-शैक्षिक उद्देश्य आदर्श व अप्राप्य स्थिति के द्योतक होते हैं जबकि शैक्षिक लक्ष्यों तक व्यक्ति पहुँच सकता है। पाठ के विशेष शिक्षण द्वारा इनको प्राप्त किया जा सकता है। शैक्षिक उद्देश्य बहुत व्यापक होते हैं तथा इनका मापन सम्भव नहीं है। जबकि शिक्षण लक्ष्य निश्चित एवं स्पष्ट होते हैं तथा इनका मापन किया जा सकता है।
हिन्दी शिक्षण के सामान्य उद्देश्य
मातृभाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
शुद्ध बोलना तथा शुद्ध लिखना।
शुद्ध, सरल, स्पष्ट भाषा में अपने भावों व विचारों को व्यक्त करना ।
उचित हाव-भाव, आरोह तथा अवरोह के साथ वाचन कला में निपुण बनाना।
दूसरों की मौखिक तथा लिखित भाषा को समझने की क्षमता का विकास करना।
बालकों की स्वाध्याय के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
बालकों को पुस्तकों में निहित ज्ञान भण्डार का अवलोकन, मनोरंजन के लिए पढ़ना गद्य, पद्य में निहित भावों को समझना तथा रसास्वादन करना।
हिन्दी शिक्षण के मूल उद्देश्य
उपर्युक्त सामान्य उद्देश्यों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि इन उद्देश्यों में कुछ ज्ञानात्मक, कुछ सृजनात्मक, ग्राह्यात्मक, रचनात्मक आदि हैं अतः इन सभी उद्देश्यों को हम निम्नलिखित वर्गों में रख सकते हैं-
ज्ञानात्मक उद्देश्य
ज्ञानात्मक उद्देश्य का तात्पर्य छात्रों को भाषा व साहित्य की मूलभूत बातों का ज्ञान प्रदान करना है। ज्ञानात्मक उद्देश्य में निम्नलिखित उद्देश्य आते हैं-
छात्रों को हिन्दी की ध्वनियों का ज्ञान कराना।
छात्रों को शब्द एवं वाक्य रचना का ज्ञान कराना ।
उच्चतर माध्यमिक स्तर पर हिन्दी की विविध विधाओं जैसे-कहानी, निबन्ध, उपन्यास, नाटक, काव्य आदि का ज्ञान देना ।
उच्चतर माध्यमिक स्तर पर छात्रों को हिन्दी साहित्य के इतिहास की सामान्य जानकारी देना ।
छात्रों को रचना कार्य के मौखिक एवं लिखित रूपों का ज्ञान देना। इनमें सस्वर वाचन, भाषण, वार्तालाप, वाद-विवाद, निबन्ध, कहानी, पत्र, आत्मकथा आदि सम्मिलित हैं।
छात्रों को सामाजिक, सांस्कृतिक पौणाणिक आदि तथ्यों से परिचित कराना।
छात्रों में तथ्यों का विश्लेषण, वर्गीकरण, तुलना तथा उदाहरण देने की क्षमता का विकास करना ।
कौशलात्मक उद्देश्य
इस उद्देश्य के अन्तर्गत पढ़ना-लिखना, सुनना-बोलना अर्थग्रहण करना आदि सम्मिलित हैं। इस उद्देश्य के अन्तर्गत निम्नलिखित उद्देश्य आते हैं
छात्रों में सुनकर अर्थ ग्रहण करने या भाव ग्रहण करने की क्षमता का विकास करना।
तथ्यों को पढ़कर भाव महण करने की क्षमता पैदा करना।
शुद्ध उच्चारण के साथ लिखित भाषा का सस्वर एवं मौन वाचन करते हुए अर्थ ग्रहण करने की क्षमता का विकास करना ।
सूक्तियों, मुहावरों, उक्तियों, उदाहरण तथा लोकोक्तियों की जानकारी कराना।
अभिव्यक्ति के लिए बोल कर या लिखकर अपनी क्षमता प्रदर्शित करना ।
आरोह, अवरोह के साथ भाषा का अध्ययन करना ।
भावों, विचारों तथा तथ्यों का मूल्याकंन करना।
सृजनात्मक उद्देश्य
इसे रचनात्मक उद्देश्य भी कहते हैं। सृजन से तात्पर्य नई मौलिक रचना की क्षमता पैदा करना है। सृजनात्मक उद्देश्य की पूर्ति के लिए निबन्ध, कहानी, संवाद, कविता, पत्र, उपन्यास आदि को माध्यम बनाया जा सकता है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित उद्देश्य आते
छात्रों में मौलिकता उत्पन्न करना तथा उसे बढ़ाना ।
मौलिक विचारों को उपयुक्त भाषा शैली में व्यक्त करना ।
छात्रों को लिखने की प्रेरणा तथा प्रोत्साहन प्रदान करना ।
छात्रों को विषय तथा प्रसंग के अनुसार शैली का ज्ञान कराना तथा उसका उपयोग करना ।
छात्रों को निबन्ध कहानी, कविता, उपन्यास, पत्र, संवाद आदि की संरचना के लिए निरन्तर प्रोत्साहन देना।
विभिन्न लेखन शैलियों का ज्ञान कराना।
भावों की अभिव्यंजना तथा विचारों के प्रगटीकरण के लिए प्रेरित करना ।
साहित्यिक क्रियाओं; जैसे- भाषण, वाद-विवाद, अभिनय अन्त्याक्षरी, कवि सम् मेलन आदि के लिए प्रोत्साहित करना ।
भावों व विचारों के साथ-साथ संवेदनशीलता, चिन्तन, मनन, तर्क, कल्पना आदि की सहायता से अभिव्यक्ति को सशक्त बनाना ।
अभिवृत्यात्मक उद्देश्य
इस उद्देश्य का तात्पर्य छात्रों के दृष्टिकोण, आदतों तथा अभिवृत्तियों का विकास करना है। अभिवृत्तियों तथा दृष्टिकोणों के विकास से मौलिकता आती है। इसमें दो अभिवृत्तियों का विकास होता है-
भाषा और साहित्य में रुचि
सवृत्तियों का विकास ।
इसके आधार में छात्र में निम्नलिखित योग्यताएँ विकसित करनी चाहिए-
छात्रों की अध्ययन के प्रति रुचि जामत करना।
पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ना ।
कक्षा व विद्यालय में होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेना।
विद्यालय की पत्रिका में भाग लेना।
साहित्यिक महत्व की पत्रिकाएँ पढ़ना ।
कवियों की कृतियों तथा साहित्यिक ग्रन्थों का अध्ययन कर उनके विचारों को क्रमबद्ध करना ।
साहित्यिक समितियों का सदस्य बनना तथा साहित्यिक चित्रों तथा तथ्यों को एकत्रित करना I
संस्कृति और सभ्यता का अध्ययन करना ।
रसात्पक एवं समीक्षात्मक उद्देश्य
भाषा एवं साहित्य का यह उद्देश्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत बालकों में रसात्मक अनुभूति अर्थात् साहित्य का रसास्वादन करना तथा साहित्य के विविध पक्षों की समालोचना का अध्ययन करना तथा स्वयं समालोचना करना। इस उद्देश्य में छात्रों को साहित्य के रस की अनुभूति कराई जाती है तथा बाद में उसकी समालोचना प्रस्तुत की जाती है।
उदाहरण के लिए कविता शिक्षण का एक उद्देश्य शिक्षक छात्रों को कविता के आनन्द को लेने की क्षमता प्रदान करता है तथा उसका'विकास करता है। वह कवि की भावना के साथ छात्रों के हृदय का तादात्म्य स्थापित कर देता है। छात्र तन-मन से कविता के भावों में डूब जाते हैं। समीक्षा के सिद्धान्तों पर प्रत्येक कविता को भाव, भाषा, रस, अलंकार आदि का ध्यान रखते हुए आलोचना की जाती है।
हिन्दी शिक्षण का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण भाषाई एवं साहित्यिक विकास करना है। इसके अंतर्गत ज्ञानात्मक उद्देश्य के माध्यम से छात्रों को भाषा की ध्वनियों, व्याकरण, विविध विधाओं, साहित्य के इतिहास तथा सामाजिक-सांस्कृतिक तथ्यों का बोध कराया जाता है; कौशलात्मक उद्देश्य द्वारा उनमें सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जैसे चारों आधारभूत भाषाई कौशलों का विकास कर भाव-ग्रहण एवं अभिव्यक्ति में सक्षम बनाया जाता है; सृजनात्मक उद्देश्य छात्रों में मौलिक चिंतन, कल्पना शक्ति और स्वतंत्र लेखन क्षमता को प्रोत्साहित करता है; तथा अभिवृत्त्यात्मक उद्देश्य उनके दृष्टिकोण, आदतों, रसात्मकता और समीक्षात्मक बोध को परिष्कृत करता है। संक्षेप में, ये सभी उद्देश्य मिलकर छात्रों को व्यावहारिक जीवन में प्रभावी संप्रेषण करने योग्य बनाने के साथ-साथ उनमें हिंदी भाषा व साहित्य के प्रति रुचि, संवेदनशीलता और मौलिकता का पोषण करते हैं।